
दोस्तों, ये हैं हमारे प्यारे भारत के मैप्स। लेकिन आखिर ये मैप्स एक दूसरे से इतने डिफरेंट क्यों हैं? तीनों में स्टेट्स का डिवीजन इतना अलग कैसे है? यहाँ पहला मैप तब का है जब भारत का पार्टीशन हुआ था और इस समय पर भारत कुछ इस तरह से एडमिनिस्ट्रेटिव यूनिट्स में डिवाइडेड था। उस दौरान, येलो कलर से मार्क्ड एरिया ब्रिटिश गवर्नमेंट के कंट्रोल में आता था, तो वहीं ब्लू कलर में मार्क्ड एरिया प्रिंसली स्टेट्स थे जिन्हें अलग-अलग किंगडम रूल करते थे। इंडिपेंडेंस के बाद, पूरे देश को एक धागे में बांधा और ब्रिटिश इंडिया के साथ प्रिंसली स्टेट्स को जोड़कर नए भारत का निर्माण किया।
आजादी के कुछ साल बाद सरकार ने स्टेट रीऑर्गेनाइजेशन कमीशन को फॉर्म किया ताकि भारत को प्रॉपर एडमिनिस्ट्रेटिव यूनिट्स में डिवाइड किया जा सके। जिसके बाद, 1956 में कमीशन की सिफारिश पर 14 स्टेट्स और छह यूनियन टेरिटरीज अस्तित्व में आईं। इस एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन ने हमें यह मैप दिया जिसमें आप सभी 14 स्टेट्स और छह यूनियन टेरिटरीज को देख सकते हैं। लेकिन इस एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन के बावजूद, कई रीजन्स ऐसे थे जो अलग-अलग कारणों की वजह से अपने लिए एक सेपरेट स्टेट की डिमांड कर रहे थे। इसी मांग के चलते धीरे-धीरे एग्जिस्टिंग स्टेट्स का फर्दर डिवीजन होता रहा और इस तरह हमें मिला हमारा आज का इंडियन मैप।
यानी एक समय जो भारत ब्रिटिश इंडिया में तीन ब्रिटिश प्रेसीडेंसीज और 565 प्रिंसली स्टेट्स में डिवाइडेड था, वो 1956 में 14 स्टेट्स और छह यूनियन टेरिटरीज में डिवाइड हो गया। और आज, 2024 में, 28 स्टेट्स और आठ यूनियन टेरिटरीज में डिवाइडेड है। इंडियन स्टेट्स का यह डिवीजन होने में लगभग 75 वर्षों का समय लग गया, लेकिन इसकी कहानी अपने आप में बेहद इंटरेस्टिंग है। और इसीलिए, दोस्तों, आज के इस वीडियो में हम भारतीय स्टेट्स के डिवीजन की इसी स्टोरी को डिटेल में समझने वाले हैं। साथ ही हम जानेंगे कि इंडिया में स्टेट्स की फॉर्मेशन के लिए किस तरह से कॉन्स्टिट्यूशन प्रोविजंस का यूज किया गया है और किन स्ट्रगल्स को फेस किया गया है।
लेकिन आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूं कि इस वीडियो की इंपॉर्टेंस क्लास 12वीं और CU एग्जाम्स के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ये वीडियो क्लास 12वीं पॉलिटिकल साइंस पार्ट 2 के चैप्टर 1 में एक महत्वपूर्ण टॉपिक को कवर करता है, तो इस वीडियो को सेव और शेयर जरूर करें। अब चलिए चलते हैं अपने वीडियो की तरफ।
दोस्तों, इस कहानी की शुरुआत होती है इंडिया में पार्टीशन के बाद से। पार्टीशन के बाद पाकिस्तान का फॉर्मेशन हुआ और भारत का काफी बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के अंडर चला गया। इस समय तक इंडिया में ब्रिटिश इंडिया की तीन प्रेसिडेंसीज हुआ करती थीं—बंगाल, मद्रास, और बॉम्बे। इन तीनों प्रेसीडेंसीज को ब्रिटिश गवर्नमेंट द्वारा अपॉइंटेड गवर्नर द्वारा रूल किया जाता था। इसके अलावा, इंडिया में 550 से ज्यादा प्रिंसली स्टेट्स हुआ करते थे जिनको रूल करने का काम डिफरेंट किंगडम्स का था और ये किंगडम्स इनडायरेक्टली ब्रिटिश गवर्नमेंट के अंडर ही रूल करते थे।
पार्टीशन और इंडिपेंडेंस के बाद भारत ने सभी प्रिंसली स्टेट्स को भारत का हिस्सा बनाया। इसका बहुत बड़ा क्रेडिट सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है। प्रिंसली स्टेट्स के भारत में जोड़ने की इंटरेस्टिंग स्टोरी को हम आने वाले एक वीडियो में कवर करेंगे जिसे आप इसी चैनल पे देख पाएंगे। लेकिन अब इंटीग्रेशन के बाद इंडिया के सामने अगला चैलेंज था—एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन क्रिएट करना यानी भारत को स्टेट्स के फॉर्म में डिवाइड करना। लेकिन आखिर इंडिया को स्टेट्स डिवीजन की नीड क्या थी?
दरअसल, इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के अकॉर्डिंग, इंडिया में फेडरल सिस्टम को अडॉप्ट किया गया है, यानी एक ऐसा मोड ऑफ गवर्नमेंट जहां सेंट्रल गवर्नमेंट को एक सिंगल पॉलिटिकल सिस्टम में रीजनल गवर्नमेंट के साथ कंबाइन किया जाता है और साथ ही दोनों गवर्नमेंट के बीच पावर्स को इक्वली डिवाइड कर दिया जाता है। आपको बता दें कि भारत में ट्रू फेडरल सिस्टम को फॉलो नहीं किया गया है क्योंकि फेडरल सिस्टम होने के बावजूद इंडिया का टिल्ट यूनिटरी फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट की तरफ ज्यादा है, यानी फेडरल सिस्टम होने के बावजूद कई सिचुएशंस में स्टेट गवर्नमेंट के ऊपर सेंट्रल गवर्नमेंट की सुप्रीमेसी होती है। और इसीलिए भारत को फेडरल स्टेट न कहकर कई कांस्टीट्यूशनल एक्सपर्ट्स क्वाज़ी फेडरल स्टेट भी कहते हैं।
लेकिन क्वाज़ी फेडरल स्ट्रक्चर को भी फॉलो करने के लिए ये इंपॉर्टेंट था कि स्टेट्स की फॉर्मेशन की जाए। लेकिन प्रॉब्लम ये थी कि आखिर स्टेट्स का डिवीजन किस बेसिस पर किया जाए? क्योंकि इंडिया इतनी डाइवर्स कंट्री है जहां पर रीजन, कल्चर या ऐसे किसी भी बेसिस पर स्टेट की फॉर्मेशन करना इंपॉसिबल था। लेकिन भारत में लिंग्विस्टिक बेसिस यानी भाषा के आधार पर स्टेट्स के फॉर्मेशन की डिमांड सबसे ज्यादा जोर पकड़ रही थी। लिंग्विस्टिक बेसिस का मतलब यह है कि अगर किसी जगह पर मेजॉरिटी हिंदी बोली जा रही है, तो उस पूरे रीजन को अलग स्टेट बना दिया जाए। और अगर किसी जगह मेजॉरिटी लोग गुजराती बोल रहे हैं, तो उसे अलग स्टेट बना दिया जाए।
हालांकि उस समय पर रूलिंग गवर्नमेंट में लगभग सभी लीडर्स लिंग्विस्टिक बेसिस पर भारत के डिवीजन के खिलाफ थे, और इसीलिए इंडियन स्टेट्स को किस बेसिस पर डिवाइड किया जाए, इस बात पर कोई कॉंक्रीट डिसीजन नहीं लिया जा सकता। पर लिंग्विस्टिक बेसिस पर डिवीजन
करने की फीजिबिलिटी को चेक करने के लिए इंडियन गवर्नमेंट ने 1948 में एक कमीशन को अपॉइंट किया। इस कमीशन के चेयरमैन थे एस.के. धार। सभी सिचुएशन को एग्जामाइन करने के बाद, इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सबमिट की। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में स्टेट्स को लिंग्विस्टिक बेसिस पर डिवाइड करना फीजिबल नहीं है। अपने सजेशंस में इस कमीशन ने एडमिनिस्ट्रेटिव कन्वीनियंस पर स्टेट्स को डिवाइड करने की सलाह दी।
सिर्फ यही नहीं, कांग्रेस गवर्नमेंट ने अपनी पॉलिटिकल पार्टी से भी एक कमेटी की फॉर्मेशन की। इसका नाम था जेवीपी कमेटी। इस कमेटी के मेंबर्स थे जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया। इस कमेटी ने भी लिंग्विस्टिक बेसिस पर डिवीजन को फेवर नहीं किया और धार कमीशन की रिपोर्ट को सपोर्ट करते हुए एडमिनिस्ट्रेटिव कन्वीनियंस पर डिवीजन करने की सलाह दी। लेकिन इस पूरे इवेंट में एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट आया 1952 में जब आंध्र रीजन के फ्रीडम फाइटर और रिवोल्यूशन लीडर पट्टी श्रीरामलू लिंग्विस्टिक बेसिस पर सेपरेट आंध्र स्टेट की डिमांड कर रहे थे। और जब उन्हें लगा कि सेंट्रल गवर्नमेंट लिंग्विस्टिक बेसिस पर डिवीजन के लिए राजी नहीं हो रही है, तो उन्होंने हंगर स्ट्राइक कर दी। यह हंगर स्ट्राइक 56 डेज तक चली, लेकिन सेंट्रल गवर्नमेंट ने आंध्र स्टेट के फॉर्मेशन को मंजूरी नहीं दी, और 56 डेज के बाद पट्टी श्रीरामलू की डेथ हो गई। उनकी डेथ के बाद आंध्र रीजन में वायलेंस शुरू हो गया। आखिरकार सेंट्रल गवर्नमेंट को पब्लिक प्रेशर के कारण आंध्र स्टेट की डिमांड को एक्सेप्ट करना पड़ा। और इस तरह लिंग्विस्टिक बेसिस पर डिवाइड होने वाला आंध्र स्टेट, पोस्ट इंडिपेंडेंट इंडिया का पहला स्टेट बना।
आंध्र स्टेट की फॉर्मेशन ने इंडिया के पोलिटिकल स्ट्रक्चर को एकदम से हिला कर रख दिया, क्योंकि एक बार जब एक स्टेट लिंग्विस्टिक बेसिस पर डिवाइड हो गया, तो दूसरे रीजन भी इसी बेसिस पर अपने लिए डिमांड करने लगे। यानी सिर्फ एक स्टेट की फॉर्मेशन ने सेंट्रल गवर्नमेंट के सामने एक बड़ी प्रॉब्लम खड़ी कर दी। इसीलिए 1953 में सेंट्रल गवर्नमेंट ने स्टेट्स रीऑर्गेनाइजेशन कमीशन की फॉर्मेशन की। इसका टास्क था भारत को सही से डिवाइड करना। इस कमीशन की चेयरमैनशिप जस्टिस फजल अली के पास थी। दो अन्य मेम्बर्स थे—के.एम. पणिक्कर और एच.एन. कुंजरू।
इस कमीशन ने तीन मुख्य फैक्टर्स के बेसिस पर अपनी रिपोर्ट सबमिट की:
- लिंग्विस्टिक बेसिस,
- स्टेट्स के हिस्टॉरिकल और कल्चरल बेसिस,
- एडमिनिस्ट्रेटिव कन्वीनियंस।
फजल अली कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर 1956 में सेंट्रल गवर्नमेंट ने स्टेट्स रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट पास किया और इस एक्ट के साथ ही 14 नए स्टेट्स और छह यूनियन टेरिटरीज का निर्माण हुआ। और इस तरह इंडिया को इसका पहला पोस्ट इंडिपेंडेंस एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन मिला। हालांकि इसके बाद भी कई स्टेट्स अलग-अलग बेसिस पर फॉर्म होते रहे और आज इंडिया के पास 28 स्टेट्स और आठ यूनियन टेरिटरीज हैं।